A-116 ऐ मेरे मन चल Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-116 ऐ मेरे मन चल

A-116 ऐ मेरे मन चल 24-7-15—7.35 PM

ऐ मेरे मन चल आज उदासी के संग हो ले
जिंदगी के अपने तरीके हैं उसी के रंग हो ले
धूप छाँव तो जिंदगी का खेल है उमंग हो ले
गम न कर आज गीले शिकवों के संग सो ले

बहुत खुश था जिंदगी के तमाम तरीकों से
लम्हा लम्हा सज धज के जिंदगी आती थी
बात बात पर मुझे देखकर वो मुस्कराती थी
प्रेरणा थी वो मेरी ज़िंदगी की ख़ुशी लाती थी

जिंदगी का एक एक अंग बहुत अपना था
अपनों के संग रचा एक बहुरंगी सपना था
इन्द्रधनुष के बीच एक रंग मेरा अपना था
मेरी जिंदगी का वो एक अदद सपना था

सुनहरी रेखाओं के बीच जिंदगी का सार था
हर एक गिला शिकवा बनता अति भार था
उसी छण जिंदगी में होता एक सुधार था
उदासी का सबब आना भी कभी कभार था

जैसी भी थी ज़िंदगी पर बहुत भाती थी
एक एक अंग को मेरे वो फड़काती थी
पर कभी कभी तो बहुत सताती थी
आँखों में आंसू फिर भी मुस्कराती थी

मुकद्दर है जिंदगी का जो कुछ अपने हुए
अपने हैं इसीलिये शिकवे और सपने हुए
अपने न होते तो गिले शिकवे कहाँ होते
किसके प्यार में मरते और सपने कहाँ होते

A-116 ऐ मेरे मन चल
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success