A-122 मुझे पता है Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-122 मुझे पता है

A-122 मुझे पता है 24-7-15—3.15 PM

मुझे पता है कि तुम क्या चाहती हो
मुझे देख मन्द मन्द क्यूँ मुस्कराती हो
हर बात में अपनी हाँ क्यूँ मिलाती हो
दिल की बात मुझसे क्यूँ छिपाती हो

एक बार मिले थे हम सावन के मेले में
बातचीत भी हुई थी बिलकुल अकेले में
आगोश में आकर हुई मदहोश सी थी
परवाह थी मगर थोड़ी बेहोश भी थी

पकडे गए थे रंग आता और जाता था
बड़ी फजीहत थी हर कोई सुनाता था
न किसी ने सुना न कोई मौका दिया था
उन्होंने तो अपना बस समझौता दिया था

प्यार जो पनपा था अब जवां हो चला है
बना कोई सिलसिला है थोड़ा मनचला है
तूफ़ान दिल का समेटे में अब आता नहीं
बेचैनी सी होती है और अब जाता नहीं

सपना हकीकत में बदलना चाहता है
बात बात पर वो कुछ ऐसे मुस्कराता है
बदलनी पड़े जो ज़िंदगी की डगर भी
थोड़ा मुस्कराता थोड़ा प्यार जताता है

पवन तेरे होठों से जब छू कर आती हैं
शैतान निगाहों में मुस्कान बिखर जाती है
तेरे चेहरे पर एक हया सी नज़र आती है
तूँ भी तो फिर मन्द मन्द ही मुस्कराती है

तुमने ही तो कहा था कि तुम प्यार करती हो
सीने से लगी थी कि तुम ये इकरार करती हो
प्यार से तुमने मुझे अपनी बाँहों में समेटा था
छूट न जाऊं कहीं कुछ इस तरह लपेटा था

सीने से लगी तुमने नज़रें भी छूपायीं थी
एक बार फिर तूँ धीरे से मुस्कराई थी
दिल की बात भी तुमने तब बताई थी
फिर तुमको भी बहुत शर्म आयी थी

मुझे पता है.......... कि तुम क्या चाहती हो, क्या चाहती हो ……
Poet; Amrit Pal Singh Gogia "Pali"

A-122 मुझे पता है
Saturday, January 20, 2018
Topic(s) of this poem: love
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