A-126 मैं जो नहीं हूँ -6.6.15 - 5.57 AM
मैं जो नहीं हूँ वही तो होना चाहता हूँ
अपनी यही बात औरों से छिपाता हूँ
जब मुस्कराता हूँ कुछ तो छिपाता हूँ
चंगा भला हूँ बस यही तो दिखाता हूँ
कितने ही दर्द जाने दिल में समेटे हैं
दिल में बेचैनी है खोये खोये लेटे हैं
अश्क आते है उनको छिपा लेता हूँ
गहरी साँसों का ज़श्न मना लेता हूँ
ज़िंदगी ने भी बहुत सारे दर्द दिए हैं
फिर भी हम मुस्कुराते हुए जिये हैं
अपने दर्द को मैंने खुद ही समेटा है
कोई नहीं जो मेरी सुध बुध लेता है
चन्द लोग हैं जो मेरा दर्द समझते हैं
साथ भी देते हैं और दम भी भरते हैं
शुक्र है खुदा का कुछ मेरे अपने हैं
जिनके साथ मैंने बुने कुछ सपने हैं
उमंग मेरी है रंग भी मैंने ही भरने हैं
जिम्मेवारी भी मेरी मैंने ही करने हैं
खुद से सच बोलना वही दिखाना है
मन पसंद पहनना मन पसंद खाना है
Poet; Amrit Pal Singh Gogia "Pali"
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