Amrit Pal Singh Gogia

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A-131 आइना देखा न करो - Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-131 आइना देखा न करो 26-7-15 8.50 AM


यूँ बदल बदल के, आइना देखा न करो
कहीं आइने को ही तुमसे प्यार न हो जाये

तूँ मुस्कराये तो मोती भी कम पड़ जाये
कहीं उसका दिल बेकरार न हो जाये

तूँ मुस्कराये तो फूल खिलते जाते हैं
कहीं उसको कोई मलाल न हो जाये

खूबसूरती की बला है तूँ और तेरा हुस्न
देखना आइने को ऐतराज़ न हो जाये

तेरे पग घुँगरू भी खूब जचते हैं
तेरे घुंगरुओं से प्यार न हो जाये

तूँ बहुत हसीं है हसीना है तूँ
तुमको देखकर कहीं उसको न बुखार हो जाये

तेरा कमर लचका का चलना तौबा मेरी
देखना चाल उसकी न कहीं खराब हो जाये

बन सँवर के यूँ न निकला करो
कहीं कोई और बवाल न हो जाये

तूँ तो मटक के निकल लेती है
कहीं उसका न बुरा हाल हो जाये

तेरे नयन शराबी झूमते हैं जब कहीं
उसकी मदहोशी पर कोई सवाल न हो जाये

तुम तो आइना भी बदल लोगी
कहीं उसको इंकार न हो जाये …. कहीं उसको इंकार न हो जाये
Poet; Amrit Pal Singh Gogia "Pali"

Topic(s) of this poem: funny love, love and friendship, relationships

Form: Lyric


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Poem Submitted: Sunday, January 21, 2018



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