वैसे है तो शैतानी है 2.7.16—7.13 AM
भड़की हुई घटा बहकता हुआ पानी है
थोड़ी छींटाकसी थोड़ी सी मनमानी है
बारिश का मौसम है रात भी सुहानी है
हवाओं के बुल्ले बहकती है जवानी है
कर ही लेते हैं वैसे है तो शैतानी है
मत छूओ मुझे अग्न भड़कती है
बदन गीला है तपस सरकती है
करीब आना भी मुनासिब नहीं है
फ़िज़ा भी देखो कैसे महकती है
तेरे बिना मुझे राहत भी नहीं है
गर्जन है कोई आहट भी नहीं है
मद्धम सी रौशनी मजा अपना है
समा जाओ मुझमें यही सपना है
तुम भी बड़े वो हो मानते नहीं हो
बदन टूट रहा तुम जानते नहीं हो
थोड़ी सी थकन अभी सो जाने दो
सब्र करो रात अँधेरी हो जाने दो
कैसे न सुनूँ दिल की आवाज़ को
सुहाने मौसम व उसके साज को
तेरे और मेरे बीच के अंतराल को
कुदरती चाहत उसके सुर ताल को
तुम भी बड़े वो हो मानते नहीं हो
जानते भी हो मगर जानते नहीं हो
तेरे बिन हम भी कैसे रह सकते हैं
मौसम की दूरी कैसे सह सकते हैं
मन मेरा भी हो रहा है थोड़ा सा हरामी है
चलो कर ही लेते हैं थोड़ी सी बेईमानी है
तुम भी बेईमान बनो करो जो मनमानी है
वक़्त भी गुजर जायेगा रात भी सुहानी है
कर ही लेते हैं वैसे है तो शैतानी है
……………वैसे है तो शैतानी है
Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'Pali'
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