A-147 तेरी रज़ा है Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-147 तेरी रज़ा है

A-147 तेरी रज़ा है 25.11.17—7: 03 AM

जब तक तुम भी हुए हमारे न थे
हम भी तुमसे कभी भी हारे न थे

नजरें हम तुमसे चुराया करते थे
जद्दो जहद से घबराया करते थे

ख़ुद ही जब मैंने इकरार किया
तुमको दिल से स्वीकार किया

दिल की धड़कनें भी बढ़नें लगी
तब कहीं मैंने तुमसे प्यार किया

हौंसले अपने बुलंद हुए जाते थे
दिल खोल नज़रें हम मिलाते थे

हम तेरी महिमा के गीत गाते थे
न हम छिपते थे न ही छिपाते थे

जब तुम मेरे करीब आ जाते थे
केवल ख़ुशियों के गीत गाते थे

आज मेरी बाँहों में आ गएहो
तो फिर तुम क्यूँ घबरा गए हो

यकीनन भरोसा टूटने सा लगा है
क्या दे रहे खुद को कोई सजा है

या इसमें भी कोई अपना मज़ा है
मैं तो खुश हूँ जिसमें तेरी रज़ा है

Poet: Amrit Pal Singh Gogia

A-147 तेरी रज़ा है
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