A-151 पेड़ का पत्ता -1.3.18 6.22 AM
मैं एक पेड़ का पत्ता हूँ
मैं धन्यवादी हूँ अपनी टहनी का
जिसने मुझे पकड़ रखा है
टहनी की उस टहनी का जिसने उसे पकड़ रखा है
टहनी की उस टहनी का जिसने उसे पकड़ रखा है
और टहनी के उस मूल शाखा का
जिसने उसे पकड़ रखा है और खुद तने से जुडी हुई है
और उस तने का जो जड़ से जुड़ा हुआ है
और हमारे लिए जड़ से जीवन को लाकर
रोज नया जीवन प्रदान करता है
और उस जड़ का जो पृथ्वी से जुडी
सारा का सारा बोझ अपने कन्धों पर
लेकर चौबीसों घंटों हमारी सेवा में तत्त्पर है
और उस पृथ्वी का जिसने
हम सब का बोझ अपने कंधे पर ले रखा है
और हमारे लिए जल का प्रबन्धन करती रहती है
और उस जल का भी धन्यवादी हूँ
जो पता नहीं आकाश पाताल से होती
सारी बाधायें लांघकर भी उन जड़ो तक पहुँचती है
जिस पर हमारी जिंदगी निर्भर करती है
उन बादलों का जो इतना पानी का भार ढोए हुए
सदा घूमते रहते हैं और जताते भी नहीं
उन वाष्प कणों का जो अदृश्य रूप से
चौबीसों घंटो हमारी सेवा में तत्त्पर है
उन किरणों का जो वाष्प कणों को
अपनी उष्मा देकर कर जीवित रखती हैं
और उस सूर्य का जो किरणों का
जन्म दाता है फिर भी कभी नहीं जताता है
और अंत में उस परमात्मा का
जिसने इतनी विशाल लीला रची
मात्र मुझ जैसे तुच्छ पत्ते को
जीवित रखने के लिए
मैं ऋणी हूँ, मैं ऋणी हूँ
Poet: Amrit Pal Singh Gogia
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