A-157 तेरी फ़ितरत 16-5-15—3.05 AMx
मेरा मज़हब भी तुम मेरा सम्मान भी तुम
मेरा रूतबा भी तुम मेरी मेहमान भी तुम
तेरे बिन तो मेरी किश्ती भी हिलती नहीं
मुझे देखकर क्यों इतनी परेशान हो तुम
मेरी मोहब्बत पर भी तुम शक करती हो
दुविधा में फंसी उसी की मेहमान हो तुम
तेरी नज़रों का मिलना कोई बेग़ैरत नहीं
फिर कैसी हया कितनी अन्ज़ान हो तुम
मुझे पाने की इल्तिज़ा तुझे मक़बूल थी
क़रीब आने को कितनी बेक़रार थी तुम
परदे के पीछे तुमने कितने सज़दे किये
पाकर मुझे क्यों इतनी परेशान हो तुम
साथ चलने का वायदा था तेरा उम्र भर
तुम निभा लोगी इसकी क़द्रदान हो तुम
जब दूर होने का फ़ैसला तुमने ले डाला
फिर इसको लेकर क्यों परेशान हो तुम
तेरा मिलना ही था जो मुबारक़ था मुझे
मेरी हर ख़ुशी तवायफ़ मेरी जान हो तुम
तेरा जाना भी अखड़ता है अब भी मुझे
रुक जाओ वापस मेरी पहचान हो तुम
Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"
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