A-170 लो तुम फिर आ गए 18.5.16- 10.09 AM
मना किया था तुम कभी मत आना
तेरे आने से हम कितना घबरा गए
किसी ने देख लिया तो क्या कहेंगे
इतनी सी बात और आंसू बहा गए
मैंने तो केवल चुम्बन ही किया था
मेरे मन में हज़ारों प्रश्न मंडरा गए
करूँ धन्यवाद इस नन्ही परी का?
जिस के आने से खुशियाँ नहा गए
न ग़म मिला न ख़ुशी का गीत कहीं
ज़िंदगी में जीने के आभास पा गए
बरसों इंतज़ार किया जिस पल का
हम उस पल उसी घड़ी में समा गए
तेरे आने में सकून था ख़लकत में
राखी बाँधने वाले नन्हे कर आ गए
किसी की हमनशीं बनकर मंडराये
सुनहरे सम्बंध बनते नज़र आ गए
किसी को बेटी वसुन्धरा बन मिले
किसी की आँचल सर्वस्व आ गए
तेरी किलकारियां जहाँ जहाँ गूँजे
किस्मत के दरवाजे स्वयं आ गए
एक और बेटी को जो रास्ता मिला
अब थोड़ा सा तो हम भी घबरा गए
दो दो बेटियों का भार कौन संभाले
दान दहेज़ के मसले हमको डरा गए
तीसरी बार तो देखो हद ही हो गयी
लक्ष्मी जी भी खुद मुझको डरा गए
बात लक्ष्मी तक होती तो ठीक थी
आज के हालात मुझको हिला गए
समाज की रचना की बात करते हैं
इंसाफ़ भी आज ख़ुद से शर्मा गए
इंसानियत जिन्दा थी चंद लोगों से
वहीं चन्द लोग इंसानियत खा गए
दहशत गर्दी से निकलूं तभी तो देखूं
कितने रावण देखो भस्मासुर आ गए
नवरात्रों में पूजी जाती थी जो कभी
आज सामग्री बन थाली में समा गए
हम कहाँ से चले कहाँ जाने के लिए
रास्ता भूल कर हम स्वयं घबरा गए
नहीं चाहिए मुझे अब बेटी पुरुस्कार
बेटे की चाहत में हम बेटी ही खा गए
ढिंडोरा झूठा पीटते हैं अपने जग में
नसीहत देते फिरते थे अब कहाँ गए
कितनी मासूम नन्हियों का दर्द देख
हम बेशर्म निकले हालात शर्मा गए
Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"
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कन्याओं / महिलाओं के प्रति समाज के दृष्टिकोण को रेखांकित करती हुई इस रचना के लिए आपका धन्यवाद.