A-174 वो बचपन की कहानी Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-174 वो बचपन की कहानी

A-174 वो बचपन की कहानी 11.12.15—2.00 AM

वो बचपन की कहानी मुझे उधार दे दो
बदले में चाहे तुम एक सौ हज़ार ले लो

रोना चिल्लाना सारा घर सर पर उठाना
मम्मी ने आना और मुझको गले लगाना

मम्मी से झिड़कों के बीच टिक न पाना
चुपके दादी के पल्लू में खिसक जाना

पल्लू के बीच सही फिर नख़रे दिखाना
मम्मी का प्यार से लपक कर ले जाना

बारिश का मौसम होता कितना सुहाना
कागज की नाव का जल थल इतराना

सीधी करते रहना फिर भी पलट जाना
सारा गुस्सा हमने चिढ़ चिढ़ के दिखाना

त्योहारों का कितना इंतज़ार हुआ करता
खुशियों का कितना इज़हार हुआ करता

रावण के वधः का भी प्रचार हुआ करता
पटाख़ों के बीच ध्वनि संचार हुआ करता

मिठाई और पिड़किआ थाली सजी होना
सुन्दर भाभी की पैरों कुमकुम लगी होना

बैठे बैठे मुस्कुराना भी कभी मलाल होना
मित्रों के बीच हँस हँस के बुरा हाल होना

पलक झपकते हवाई जहाज को उड़ाना
इतरा इतरा कर भागना उड़ के दिखाना

भागते भागते जब बिस्तर पर गिर जाना
मम्मी का आना और डण्डे का दिखाना

गुड्डे गुड़िया की शादी का इंतज़ार होना
रात रात उठकर गुड़िया के बाल धोना

शादी की तैयारी और आशीर्वाद दे दो
मेहमानों की ख़ातिर थोड़ा प्रसाद दे दो

वो बचपन की कहानी मुझे उधार दे दो
बदले में चाहे तुम एक सौ हज़ार ले लो

Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"

A-174 वो बचपन की कहानी
Tuesday, March 10, 2020
Topic(s) of this poem: childhood,family
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