A-177 मेरे आने से Poem by Amrit Pal Singh Gogia

A-177 मेरे आने से

A-177 मेरे आने से

मेरे आने से जो यह सवाल हो गया है
ऐसा क्या किया जो बवाल हो गया है

यही सोच सोच कर आगे बढ़ रहा हूँ
हर बात पर अडिग यूँ ही अड़ रहा हूँ

सुनना समझना बहुत दूर की कथा है
मैं तो अपनी भाषा में ही उलझ रहा हूँ

जिंदगी की सच्चाई से कोसों दूर कहीं
भ्रमित होकर मैं सबकुछ समझ रहा हूँ

मैं नहीं था तब भी दुनिया चल रही थी
जब चल रही है तो अब क्यों डर रहा हूँ

हमारे रुख़्सत होने पर भी चलती रहेगी
फिर मरने से पूर्व ही मैं क्यों मर रहा हूँ

ऐसा लगता है कि अकेला रह गया हूँ
सोने के सिल्ली के संग मैं बह गया हूँ

बिना माया किसी का गुजारा नहीं है
माया जो नहीं तो कोई हमारा नहीं है

मैं ऐसे ही झूठ की संगत में जी रहा हूँ
कभी मीठे व् कभी कड़वे घूँट पी रहा हूँ

शुक्र है उनका जिन्होंने मुझको पाला है
ऋणी हूँ उनका जिन्होंने मुझे संभाला है

आभारी हूँ उनका जो मुझे सहते आये हैं
नहीं चाहते हुए भी मेरे संग रहते आये हैं

माफ़ी चाहता हूँ जो मुझे सुनते आये हैं
मन रिश्ते तोड़ता रहा वह बुनते आये हैं

मसला जो उठा था वो मेरे सम्मान का
आज अहसास हुआ उनके एहसान का

आज मैं नहीं हूँ तो सब कुछ मेरे पास है
जीने का अहसास हुआ अब बिन्दास है

Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"

A-177 मेरे आने से
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