A-193 तेरे क़रीब आना 23.2.18—9.43 PM
जब भी मैंने चाहा तेरे क़रीब आना
तुमने दूर रहने की रस्म निभायी है
आज जब मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ
तो तुमको मेरी याद क्यों आयी है
सब झूठ है कि कोई अपना होता है
ग़ैरों से रिश्ता हुआ यह भी धोखा है
दग़ा अपनों ने दी जो कभी पराए थे
अपना कहते हुए कैसे मुस्कुराये थे
अपनों के बीच ही तो हम बेगाने हुए
कैसे कहूँ तुम मेरी हो हम दीवाने हुए
मेरी आवाज़ भी तुम्हें अब भाती नहीं
सच है अब रात आती है जाती नहीं
बड़ी ग़लती हुई जो दामन थामा था
इस बात का भी एहसास दिलाते हैं
ज़िन्दगी जो जी वह एहसान नहीं है
हमने शपथ ली थी याद दिलाते हैं
क़समें खाते थे आज जान खाते हैं
फिर भी हद है हमें अपना बताते हैं
झगड़ा भी अपनों से हुआ करता है
मुझको भी यही कहकर रिझाते हैं
Poet: Amrit Pal Singh Gogia "Pali"
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