अपना हाथ भी आज तो अपना नहीं Apnaa Haath Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

अपना हाथ भी आज तो अपना नहीं Apnaa Haath

अपना हाथ भी आज तो अपना नहीं

कहीं चू के चा नहीं है
नोटबंदी का मुद्दा ही नहीं है
तुम बुरा मानो या भला
उसने तो काम कर ही डाला।

'चोर की माँ कोठी में सर डाल के रो रही है'
कई लोग पुराने नॉट गंगा में बहा रहे है
जो होना था वो तो हो ही गया
जहाँ छीपा हुआ था वहां छीपा ही रह गया।

तकलीफ तो पड़ी पर माल भी तो मिला
हजारो के नॉट युही खातों में आ मिला
रोज खड़े रहने के भी पैसे और साथ में फोग़ट का खाना
खूब चला भाई ये नोटबंधी का बहाना।

कितनो की दाल बिना गले ही खराब हो गयी
मियाँ शरीफ के लेजाने की तो चाबी ही गुम हो गयी
सब माल रद्दी के भाव बिक रहा
कोई कुछ भी नहीं बोल रहा।

राहुलभाई की बांह फट गयी
केजरीवाल की हवा निकल गयी
मायावती के हाथी का भूख हाल बेहाल है
करीबन सब खूबसूरत चेहरों का यही हाल है।


बस रोनेवाले रोते गए
मरे हुए पर और लात क्यों लगाए?
बेचारे साथ होते हुए भी साथ नहीं
अपना हाथ भी आज तो अपना नहीं।

अपना हाथ भी आज तो अपना नहीं Apnaa Haath
Tuesday, January 31, 2017
Topic(s) of this poem: poem
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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