S.D. TIWARI

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Bewafa Nikala (Hindi Ghazal) बेवफा निकला - Poem by S.D. TIWARI

बेवफा निकला

जिसे महबूब समझा था वो बेवफा निकला।
जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ के सफा निकला।
मंजिल तो उसकी और ही पहले से तय थी
जुट गया उन कामों में जिनमें नफा निकला।
बोल के गया संवार देगा जिंदगी एक दिन
वादा का हर पलटा हुआ कोरा सफा निकला।
करके निगाहें मेरी ओर वो मीठी बोल गया
फिर निगाहें फेर बगल से कई दफा निकला।
मैंने तो अपना जान, दे दिया मत उसको
वो बात भी न करता जैसे खफा निकला।
मेरे संग बहुतों ने किया भरोसा उस पर
मगर मतलबी वह, करता जफ़ा निकला।
अपने रहने लगा महलों के अंदर जाकर
हमें गेट पर ही रोकता हर दफा निकला।

- एस० डी० तिवारी

Topic(s) of this poem: hindi, politics, satire


Comments about Bewafa Nikala (Hindi Ghazal) बेवफा निकला by S.D. TIWARI

  • Mohammed Asim Nehal (11/27/2015 6:34:00 AM)


    Badhiya kavita hai...maza aa gaya. Dhanyavaad. (Report) Reply

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Poem Submitted: Friday, November 27, 2015

Poem Edited: Saturday, November 28, 2015


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