परिपक्य होना हैं 😟
मुझे जाना होगा ठलना होगा इस जीवन के पैमाने में
जलना हैं इस जीवन की ज्वाला में,
बहोत दूर..., बहोत दूर तक जलना हैं!
और खुद को परिपक्य बनाना हैं
मैं आऊँगा मेरा इंतज़ार करना तुम
हे राम... ये अनंत दूरी...
मैं आऊँगा तुम्हारे पास
एक हवा की तरह आऊँगा
जिसमे घुले होंगे मेरी यादें
तुम्हारे घर के झरोखों से देखोगी तुम मुझे
जो तुम्हारी होठों पर मुस्कान
लाने मे बाध्य होंगे
मैं जब तुम किताबें पढ़ने बैठो
तो मै एक नींद बनकर आऊँगा
और ले जाऊँगा तुम्हे सपनों की दुनिया में
तुम्हारे हाथों मे हुआ हल्का अंजाना
स्पर्स बनकर आऊँगा
मैं इस जोरदार बरसती बरसात की बूँदों मे आऊँगा
तुम महसूस करना मुझे बूँदों में...
जो मेरा तुम्हे विरह करने का प्रमाण होगा
मैं आऊँगा
भीड़ मे मच रहे शोर मे अचानक कानों मे सुनाई पड़े (मेरा नाम) एक आवाज की तरह आऊँगा
इस तरह..., उस तरह..., हर तरह...,
मैं आऊँगा
मैं इस निर मे, इस जग जीवन की तापिस व व्यथा मे झुलस कर व पूर्ण मुक्त, ख़ुद को तुम्हारे परिपूर्ण परिपक्य बना कर आऊँगा
और जब मैं परिपूर्णता, परिपकता को पा जाऊँगा, हासिल हो जाऊँगा
जब तुमसे मिलने आऊँगा
थामूंगा तुम्हारे हाथों को
तुम महसूस करोगी उस अनजाने स्पर्स को...
और तब प्रेम सुधा तुम्हारी आँखों से बहेंगे और
मै उन्हें अपने हाथों से पी जाऊँगा
मैं आऊँगा मेरा इंतज़ार करना
Incomplited! ! ¶
Copyright © Nitin Kumar
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