प्रेम एक - कर्म दर्पण Poem by Nitin Kumar

प्रेम एक - कर्म दर्पण

अब तो मुझे प्रेम एक दर्पण जैसा लगता हैं
दर्पण मे ख़ुद की ही आकृति मुझसे कहती
उसे छूने से पहले अपने आप को देख ले
क्या परिपूर्ण हैं उस आईने को छूने के लिए
देख किसी भ्रम मे ना रह की वह एक आईना हैं
ये तेरा भाग्य हैं, तेरा कर्म दर्पण हैं,
इसके स्पर्श मात्र से ये तेरी पूरी जीवनी पढ़ लेगी
Incomplited.
Copyright © Nitin kumar

प्रेम एक - कर्म दर्पण
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मै नितिन कुमार यह मेरी लिखी कविता हैं, मेरी आत्मा से उबगी हैं, कैसे लगी आप सभी को जरूर कंमेंट मे बताये! !
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