Chay Ki Chuski (Hindi) चाय की चुस्की Poem by S.D. TIWARI

Chay Ki Chuski (Hindi) चाय की चुस्की

चाय की चुस्की

चाय ही जिंदगी है, चाय ही बंदगी है।
चाय मन की चाहत, चाय ही ताजगी है।
सो रही रैन को, चाहे दिनकर जगाएं,
सोये मन को जगाती, चाय की चुस्की ।

प्रातः उठते ही जिह्वा पर चाय का नाम।
बाद में ही हो पाता अपनों से राम राम।
और देशों के बारे में तो नहीं कह सकता
भारत भाल को जगाती, चाय की चुस्की।

सर्दी के मौसम में ये बड़ी राहत देती।
कड़क चाय की प्याली, कुछ गर्माहट देती।
घर के भीतर हों चाहे कहीं हों बाहर,
घेरे सुस्ती को भगाती, चाय की चुस्की।

भोर होते, ननुआ की भट्टी जल जाती है,
उजाला होते ही भीड़ जुट जाती है।
देश के हालात पर बहस छिड़ जाती है।
प्रातः अख़बार पढ़ाती, चाय की चुस्की।

यहीं से शुरू होती, देश की राजनीति।
पक्ष, विपक्ष, बताते अपनी अपनी नीति।
तर्क वितर्क करते, पार्टियों के समर्थक,
गरमागरम बहस चलाती, चाय की चुस्की।

कभी कभी गर्माहट, बहुत बढ़ जाती।
ननुआ के सिर पर, चिंता चढ़ जाती।
सदन के सभापति सा मौन हो जाता;
बीच बीच में और! पुछवाती, चाय की चुस्की?

हर सभा की कार्यवाही को देती ब्रेक।
सरकारी काम की गति कर देती तेज।
ग्राम सभा, विधान सभा, लोक सभा;
हर सभा पूरी करवाती, चाय की चुस्की।

कभी डील, कभी रिश्तो को फील कराती।
कभी अतिथि के स्वागत में जुट जाती।
कभी यादों में डूबी, तो कभी बिसराती;
रिक्त समय में साथ निभाती, चाय की चुस्की।

आम आदमी के मुंह लगी, मुंह बोली है।
भजन, कीर्तन, यात्रा में हमजोली है।
लगता है कि कितनी बड़ी निधि खोयी है,
किसी दिन नहीं मिल पाती, चाय की चुस्की।

(C) एस० डी० तिवारी

Thursday, December 11, 2014
Topic(s) of this poem: humor,hindi
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