धड़ लिए चलता हूँ
आत्मा तो पहले मर चुकी है,
धड़ लिए चलता हूँ।
चेतन की अब क्या बात करूँ!
जड़ लिए चलता हूँ। धड़ लिए...
ना झुकता, ना मुड़ता हूँ मैं,
काठ के उल्लू सा रहता हूँ मैं,
आसमान में दृष्टि रखता;
अकड़ लिए चलता हूँ। धड़ लिए...
कैसे काला ना होऊं, बताओ!
मैं मतवाला न होऊं, बताओ!
खान में कोयले की चट्टानों से,
रगड़ लिए चलता हूँ। धड़ लिए...
राहों में यूँ गिरते फिसलते,
गोता लगाते, कभी सम्हलते,
मिले न सहारा तो कीचड़ की;
पकड़ लिए चलता हूँ। धड़ लिए...
- एस० डी० तिवारी
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