धरती माँ यही तो पुकारर्ती रहती है
अमरीश से बारिश
पूरी हो गयी ख्वाहिश
हम रहे सदा अहर्निश
कुदरत की करे सदा कुर्निश
हमारी सुनती है वो
नहीं मन में लेती कोई गिनती
कितने जुल्म हम ढोते है
फिर भी अमी बरसाती है वो
धरती से होता है जब मिलन
किसी को नहीं होती कोई ख़लल
सब मस्त हो जाते है फुहारों में
नजारा खूब बनता है बहारो में
यहीं तो उपहार है
कुदरत का हमपर उपकार है
हम काले बालवाले सरफिरे उसकी कदर नही करते
सरे आम पेड़ काटते है और कुदरत की तौहीन करते रहेते है
सब कुछ तो दिया है जीने के लिए
बिछाना भी दिया है सोने के लिए
और क्या चाहिए जीवन में जिंदगी बिताने के लिए?
सपने तो सुहाने होते ही है देखने के लिए
आओ हम सब उसकी रक्षा करे
अपने ही पाँवपर कुल्हाड़ी का प्रयोग ना करे
हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है
धरती माँ यही तो पुकारर्ती रहती है
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि धरती माता के उपकारों का कोई अंत नहीं होता है. हर व्यक्ति को कविता का संदेश समझना चाहिए: अपने ही पाँवपर कुल्हाड़ी का प्रयोग ना करे / हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है. अपने ही पाँवपर कुल्हाड़ी का प्रयोग ना करे हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है
हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है धरती माँ यही तो पुकारर्ती रहती है
welcome manish sharma n manish vyas Just now · Unlike · 1 2 Sep
Nance Saxena likes this. Hasmukh Mehta welcome Just now · Unlike · 1 2 Sep
Prem Lata likes this. Hasmukh Mehta welcome Just now · Unlike · 1 2 Sep
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ta welcome vipin dhakad Just now · Unlike · 1 2 Sep
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Syahee.com likes this. Hasmukh Mehta welcome Unlike · Reply · 1 2 Sep by hasmukh amathalal | Reply