Hasmukh Amathalal

Gold Star - 420,853 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

धरती माँ Dharti Maa - Poem by Hasmukh Amathalal

धरती माँ यही तो पुकारर्ती रहती है

अमरीश से बारिश
पूरी हो गयी ख्वाहिश
हम रहे सदा अहर्निश
कुदरत की करे सदा कुर्निश


हमारी सुनती है वो
नहीं मन में लेती कोई गिनती
कितने जुल्म हम ढोते है
फिर भी अमी बरसाती है वो

धरती से होता है जब मिलन
किसी को नहीं होती कोई ख़लल
सब मस्त हो जाते है फुहारों में
नजारा खूब बनता है बहारो में


यहीं तो उपहार है
कुदरत का हमपर उपकार है
हम काले बालवाले सरफिरे उसकी कदर नही करते
सरे आम पेड़ काटते है और कुदरत की तौहीन करते रहेते है

सब कुछ तो दिया है जीने के लिए
बिछाना भी दिया है सोने के लिए
और क्या चाहिए जीवन में जिंदगी बिताने के लिए?
सपने तो सुहाने होते ही है देखने के लिए

आओ हम सब उसकी रक्षा करे
अपने ही पाँवपर कुल्हाड़ी का प्रयोग ना करे
हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है
धरती माँ यही तो पुकारर्ती रहती है

Topic(s) of this poem: poems


Comments about धरती माँ Dharti Maa by Hasmukh Amathalal

  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/2/2015 8:28:00 PM)


    welcome manish sharma n manish vyas Just now · Unlike · 1
    2 Sep
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/2/2015 8:27:00 PM)


    Nance Saxena likes this. Hasmukh Mehta welcome Just now · Unlike · 1
    2 Sep
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/2/2015 8:27:00 PM)


    Prem Lata likes this. Hasmukh Mehta welcome Just now · Unlike · 1
    2 Sep
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/2/2015 8:26:00 PM)


    Prem Lata likes this. Hasmukh Mehta welcome Just now · Unlike · 1
    2 Sep
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/2/2015 8:26:00 PM)


    ta welcome vipin dhakad Just now · Unlike · 1
    2 Sep
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/2/2015 8:26:00 PM)


    Syahee.com likes this. Hasmukh Mehta welcome Unlike · Reply · 1
    2 Sep by hasmukh amathalal | Reply
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  • Rajnish Manga (9/1/2015 10:41:00 PM)


    इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि धरती माता के उपकारों का कोई अंत नहीं होता है. हर व्यक्ति को कविता का संदेश समझना चाहिए: अपने ही पाँवपर कुल्हाड़ी का प्रयोग ना करे / हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है.

    अपने ही पाँवपर कुल्हाड़ी का प्रयोग ना करे
    हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (9/1/2015 7:07:00 PM)


    हम क्यों अपना अस्तित्व जोखम में डाल रहे है
    धरती माँ यही तो पुकारर्ती रहती है
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Poem Submitted: Tuesday, September 1, 2015



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