जब मुद्दाविहीन हो जाओ,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब स्वयं को आधुनिक दिखाना हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब स्वयं को बुद्धिजीवी साबित करना हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब सेकुलर और लिबरल दिखना हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब ‘वोक' होने का प्रमाण देना हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब दलितों का हितैषी दिखना हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब जाति-विरोध का
‘सूमो फाइटर' बनना हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब परिक्षा में शुन्य अथवा माइनस अंक आयें,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करनी हो,
तो मनुस्मृति को गाली दो।
जब सुरक्षा बल दंगाईयों और अपराधियों को नियंत्रित करे, तो मनुस्मृति को गाली दो।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
कि संस्कृत का ज्ञान कितना है,
मनुस्मृति को वास्तव में पढ़ा भी है या नहीं।
फर्क इससे भी नहीं पड़ता
कि जिस ग्रंथ की आलोचना की जा रही है,
उसका ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ क्या है।
बस एक काम जरूरी है—
मनुस्मृति को एक सुविधाजनक निशाना बना लेना।
विडंबना यह है कि
अन्य धर्मों के ग्रंथों में मौजूद
आपत्तिजनक या विवादास्पद बातों पर
उसी निर्भीकता से सवाल उठाने का साहस
अक्सर दिखाई नहीं देता।
मनुस्मृति शायद असली मुद्दा है ही नहीं।
असली प्रश्न है—
अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए
किसे सुविधाजनक निशाना बनाया जाए।
एक ऐसा निरीह शिकार,
जिस पर बिना पर्याप्त ज्ञान के,
बिना ऐतिहासिक संदर्भ के
और बिना समग्र दृष्टि के
लगातार प्रहार किया जा सके।
आलोचना होनी चाहिए—
हर विचार की, हर परंपरा की,
हर धर्मग्रंथ की, हर सामाजिक व्यवस्था की—
जहाँ भी अन्याय, भेदभाव या अमानवीयता दिखाई दे।
लेकिन आलोचना का पैमाना
सबके लिए एक जैसा होना चाहिए।
किसी एक ग्रंथ को निशाना बनाकर
अपनी आधुनिकता, बुद्धिजीविता, सेकुलरिज्म या प्रगतिशीलता का प्रमाण देना
न तो ज्ञान है, न साहस।
सच्चा साहस तो तब है
जब बहस का वही पैमाना
हर धर्मग्रंथ और हर परंपरा पर लागू करके दिखाया जाए।
क्योंकि समस्या किसी एक ग्रंथ को निशाना बनाने में नहीं,
समस्या चयनात्मक आलोचना में है।
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