आज फिर जंतर-मंतर ने देखा,
सत्ता का जूतम-पैजार देखा।
नूरा-कुश्ती के रंगमंच पर,
लोकतंत्र का व्यापार देखा।
मंच पर अनशन का अभिनय था,
कैमरों का सारा आकर्षण था;
पर उसी शहर के चौराहों पर
भूख से बिलखता बचपन था।
एक कृशकाय देह को उठाकर
स्ट्रेचर पर सम्मान मिला,
पत्नी की व्याकुल पुकार के बाद
फाइव-स्टार अस्पताल मिला।
पर क्या आलीशान कमरों से
अराजकता मर जाती है?
क्या वातानुकूलित दीवारों में
जन-पीड़ा सो जाती है?
अराजकता केवल भूख नहीं,
धन की भी संतति होती है;
कुर्सी, सत्ता और सुख की चाह
हर युग की विपत्ति होती है।
सत्ता और भीड़ पेट भी भर देती है,
आत्मा और शर्म हर लेती है;
विवेक की अंतिम लौ बुझाकर
सुनने की शक्ति छीन लेती है।
सत्ता का एक खेल अस्पताल में,
दूजा सड़कों की धूल में था;
एक कैमरों की रोशनी में,
दूजा जनता की भूल में था।
एक वृद्ध को अनशन पर बिठाकर
सबने पेट भर-भर भोजन खाया;
राजनीति की चौसर पर फिर
हर मोहरे ने स्वार्थ निभाया।
वर्दीधारी बूटों की आहट सुन
नारे भी सहमे, भीड़ भी भागी;
प्रश्न वहीं के वहीं खड़े थे,
उत्तर की हर राह थी त्यागी।
भीड़ का शोर लोकतंत्र नहीं,
पत्थर जनमत बनते कब हैं?
सिंहासन मतों से बनते हैं,
नारों से कब टिकते सब हैं?
एक अनशन अस्पताल में
आराम की चादर ओढ़े था;
दूजा मंच पर सत्ता की
नई पटकथा गढ़े था।
सत्ता की नब्ज़ किसी स्ट्रेचर पर
कभी नहीं धड़क पाती है;
वह तो केवल जनता के
विश्वास में बस जाती है।
जब जनता का मन बदलता है,
सिंहासन भी हिल जाते हैं;
भीड़ की ढपली बजती रहती,
राजपथ फिर बदल जाते हैं।
इतिहास यही हर बार कहे—
जनता अंतिम निर्णायक है;
सत्ता क्षणिक है, सत्य अमर है,
यही लोकतंत्र का नायक है।
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