खुद्दारी से
मेरी बसी है जान
फिर भी में रहा अनजान
तिरंगा मेरी रहा है शान
लुटा भी दूँ जान।
फिर भी शांति का चाहक
मेरे देश कामें बनु संवाहक
यदि में कुछ काम आ सकूँ
अपने आप को अदना सेवक कह सकूँ।
बलिदान देना चाहता हूँ
अपने खून का एक एक कतरा उसके लिए रखाहूँ
पता नहीं किस मोड़ पे में देश के काम आ सकूं
अपने आपको धन्य महसूस कर सकूँ।
उसका रंग तो देखो
त्याग और बलिदान के जज्बे कोसामने रखो
देश के लीए आप गर्वान्वित हो ने का अनुभव करेंगे
देश के लोए सब लुक न्योछावर कर देंगे।
यही है देशभक्ति और मिसाल
देश रहेगा खुशहाल
जनता भी रहेगी अमनचैन से
गर्व से ऊंचा सर रखकर कसम खाएंगे खुद्दारी से।
welcome vagat singh Like · Reply · 1 · Just now Manage
welcome mira kumar ghambhir · Reply · 1 · Just now
welcoem welcome dharmendra pandit Like · Reply · 1 · Just now · Edited Manage
welcome sukhdev desai Like Like · Reply · 1 · Just now
welcome jigishn variya Like · Reply · 1 · Just now
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
welcome prakassinh vansia Like · Reply · 1 · 1 min Manage