Kiraye Ki Jindagi (Hindi)किराये की जिंदगी Poem by S.D. TIWARI

Kiraye Ki Jindagi (Hindi)किराये की जिंदगी

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किराये की जिंदगी

खुदा! तूने पटका, जहाँ पे जमीं पर,
अस्पताल का था, किराये काबिस्तर।

पाया था साया, आँचल का माँ के जो,
प्यार के साये में, लगा, होगा बसर।

बड़ा होता गया, साया छिनता गया,
बदले हालात, दिन बा दिन इस कदर।

जुटाने के वास्ते रोटी दो वक्त की,
भटका रात और दिन, शहर से शहर।

बदलता रहा सदा रहने की खातिर,
सस्ता या मंहगा, ले किराये का घर।

की दिल की तलाश, सुन दिल की आवाज,
निकल कर बाजार में, घूमा दर बदर।

दिल जो मिला, लगा किराये का वो भी,
रखता कमबख्त, बटुए पे मेरी नज़र।

मौत आई तो समझे, मिल गयी निजात,
देना होगा किराया, खुदा के ना घर।

सराय में रुका एसडी, कुछ पल के लिए,
दिया दो गज का किराया, खुदी तब कबर।

(C)एस० डी० तिवारी

Friday, July 6, 2018
Topic(s) of this poem: hindi,life
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 06 July 2018

Excellent philosophical musings about life and death. Thanks for sharing.

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