वो झूठ बोल कर जीतता गया, मैं सच का दामन पकड़े रहा ।
वो मुझको हमदर्दी दिखाता गया, मैं दुश्मन को दांव सिखाता रहा।
वो कबिल था, मैं आशिक था, वो मंसूबे छिपाता गया, मैं दिल का हाल बताता रहा ।
वो तजुर्बेकर था, मैं वाजिब था, वो हासिल करता गया, मैं काबिल बनता रहा ।
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Seems A refined poetic imagination, Vibhor Jain. You may like to read my poem, Love And Iust. Thank you.