जंगल में आग लगी है
और मेरे घर कोसों दूर है
पेड़ पौधे जल रहे हैं
शोले भड़क रहे हैं
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आज समाज को हमने वर्गों बे बाँट दिया है, धर्म के नाम पर जाती के नाम पर, स्थान के नाम पर और न जाने कितने और नए तरीके विभाजन के और खोज लाये हैं, और जब कहीं अत्याचार होता है हम ये कहकर की इससे हमें कोई सरोकार नहीं है तमाशा देखने लगते हैं
Brilliant poem, Kya baat hai, I will translate it in English.
इस कविता में सीक है, कविता सोचने पर मजबूर करती है, आज के हालत की सही समीक्षा करती है
धन्यवाद दीपक जी आपने कविता का सही विश्लेषण किया है और कवी जो कहना छह रहा है उसके अत्यधिक रूप से उजागर किया है I
जंगल में आग लगी है एक कटाक्ष भरी कविता है, हम ये समझ कर संतोष पते हैं की हम सुरक्षित हैं लेकिन कब ये सुरक्षा कवच हट जायेगा इसके बारे मैं नहीं सोचते
हमारे भीतर का इंसान मर चूका है, इंसानियत ख़त्म हो गयी है, ये कविता हमें खुद आईना दिखने का एक प्रयास है, की देखो अपने चेहरों को और सोचो क्या से क्या हो गए हैं हम.