मैं हिंदी हूँ
मैं हिंदी हूँ
मैं हिंदी हूँ। हाँ, हिन्द की हिंदी हूँ।
अपने ही कुठाराघात करते, फिर भी जिन्दी हूँ।
माँ सरस्वती की मैं सबसे दुलारी बेटी हूँ।
संकट आता है तो उसी का नाम लेती हूँ।
माँ ने कहा था, तू भारत पर राज करेगी।
भारत के लोगों का इतना प्यार मिलेगा कि नाज करेगी।
शायद, तभी भारत सरकार ने मुझे राज-भाषा बनाया।
और राष्ट्र-भाषा बनने की भरपूर आशा जगाया।
भारत में ही पल रहीं मेरी दो दर्जन सुता हैं।
लाड़ प्यार इतना मिला, वो भी रखतीं प्रभुता हैं।
वो सब, अब काफी बड़ी हो गयी हैं।
बराबर में, ऐंठ कर, खड़ी हो गयी हैं।
उनमें से कई तो बहुत मगरूर रहती हैं।
अपनी सुंदरता पर बड़ा गरूर रखती हैं।
तुम्हें पता ही है, कितने प्यार से मैं उनको देखी भाली।
कई प्लास्टिक सर्जरी करवाकर, रूप तक बदल डालीं।
तेलुगु, तमिल ने तो ऐसा मुंह मोड़ा है।
मुझसे बात तक करना भी छोड़ा है।
नहीं समझना कि भोली भाली हैं।
कन्नड़ और मलयाली भी बड़ी मतवाली हैं।
सब की सब मुझसे बड़ी दिखना चाहती हैं।
बेटी होकर भी ऊँची खड़ी दिखना चाहती हैं।
पंजाबी, बंगला, मराठी, उड़िया, गुजराती,
राजस्थानी भी मुझसे कुछ प्रेम अवश्य जतातीं।
असमी, कश्मीरी भी कुछ अलग सी रहती हैं।
मन चाहे कुछ भी हो, पर मेरा भला ही कहती हैं।
उर्दू तो वैसे अभी सखी बनकर खड़ी है।
पर कौन जाने, बदल जाये कौन सी घड़ी है।
इन सबसे मैं क्या कहूं! आखिर मेरी बेटी हैं।
मेरे भारतवासियों के सहारे ही अपनी नाव खेती हैं।
कुछ बनतुओं की बात, तुमसे कहाँ से कहूं।
उनकी करनी पर चुप भी कैसे रहूं।
उनको तो गोरी अंग्रेजी से है प्यार।
उसके लिए नहीं चूकते, मुझ पर करने से अत्याचार।
वे बस रंग देख रहे, रस का उनको ज्ञान नहीं।
दिया जो मैंने गौरव है, उसका उन्हें अभिमान नहीं।
मेरे पास राग है, अनुराग है,
फूलों का बाग है,
भ्रमर का पराग है,
चांद का लगा दाग है,
टेसू की आग है,
चोटी का नाग है,
प्रभु का सन्मार्ग है।
उसके पास क्या है?
न मधुमास है, न फाग है,
न कोयल है, न काग है,
न सिंदूर है, न सुहाग है।
बस जिंदगी का गुणा भाग है।
फिर भी अकड़ रखती है,
प्रशासन पर पकड़ रखती है ।
किसी तरह सब दुःख सह रही हूँ।
तुम्हारा सम्मान है, जिसके सहारे रह रही हूँ।
बेटियों को लगता, उनके घर हस्तक्षेप कर रही हूँ।
जब कि उन सभी को मैं एक कर रही हूँ।
मुझे ज्ञात है, अगर मैं न रही, आपस में लड़ मरेंगी।
स्वयं तो डूबेंगी, मेरा नाम मटियामेट करेंगी।
मैं तो तुमसे ही कहती हूँ, समझाओ उन्हें।
बड़ों का सम्मान करना सिखाओ उन्हें।
घर में बड़े का होना, कितना लाभ देता है।
बड़ा ही संरक्षण और सही राय देता है।
बड़े परिवार में मिलजुल कर रहोगी।
अपने राष्ट्र को हिंदुस्तान महान कहोगी।
अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली,
मालवी, मेवाती, कांगड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली।
ये सब की सब अभी छोटी हैं।
आकर खेलती मेरी गोदी हैं।
इनको तो मैं स्वयं ही सम्भाल लूंगी।
अपने ही बूते इनको पाल लूंगी।
बेटियों की लड़ाई समाप्त हो तो विश्व भ्रमण पर जाऊं।
तुमसे मिले प्यार के सहारे, सारे संसार में धाक जमाऊं।
जो निधि छुपाये हूँ मैं मुझमे, माँ वीणापाणी जानती है।
तभी तो अपनी वीणा का सुर, ब्रह्मा की वाणी मानती है।
तुम्हारे लिए वसुधा पर आयी, देवलोक की वासिन्दी हूँ।
हाँ, मैं हिंदी हूँ। हिन्द की हिन्दी हूँ।।
- एस डी तिवारी
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