Hasmukh Amathalal

Gold Star - 384,598 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

मंज़िल manzil - Poem by Hasmukh Amathalal

मंज़िल

मंज़िल को पाना इतना आसान नहीं
और पा भी लो तो कोई एहसान नहीं
यह तपस्या और लगन है
जिया बस उसी में ही मगन

मंज़िल तो मैंने पा ली है
पर वो वचन की पक्की है
कही भी ओछी हरकत उसे पसंद नहीं
कोई गलत बात का विवाद भी नहीं

खूबसूरत ऐसी जैसे गुलाब फिक्का लगे
सुबह की शांति में जैसे गुंजन होने लगे
उसकी आवाज में मिठास है
हमें भी अच्छा लगता उसका सहवास है

यह सिलसिला बस चलता रहे
मेरे कारवाँ को बस पथदर्शक मिलता रहे
उनके आने से ही बस दिल बागबाग हो जाता है
उनका मुझे मालूम नहीं पर आभास जरूर हो जाता है

मंज़िल राज हमें पता नहीं
हमें उनके बारे में जानना भी नहीं
बस वो खिलते रहे, महकते रहे
हमारी रहह में कभी कभी आते रहे

में पुकारू और वो मुझे सामने दिख जाए
बस दिल में थोड़ी सी ख़ुशी भर जाए ]
तमन्ना बस छोटी सी है
अरमान जगे है पर आरजू खोटी नहीं है


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Poem Submitted: Thursday, April 2, 2015



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