थोड़ा आ जाता है जोश, पीने के बाद।
दिल हो जाता है खरगोश, पीने के बाद।
खो देते होंगे लोग मदिरालय जाकर,
हमें तो आता ही है होश, पीने के बाद।
होती परवाह कहाँ, भर जाने पर जाम,
खाली भी हो जाय कोष, पीने के बाद।
आने लगता है मजा थोड़ा थोड़ा सा जब,
क्यों दिखाने लगते हो रोष, पीने के बाद।
रखते तो यूँ हमेशा ही मुंह बंद कर के,
कहो कैसे रहें खामोश, पीने के बाद।
भाग जाता गम, लौ से अँधेरे की तरह,
दिल रखता है जो पोष, पीने के बाद।
बहक जाएँ अगर, सम्हालना न बेशक,
मगर देना ना तुम दोष, पीने के बाद।
- एस. डी. तिवारी
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem