शूद्रों की व्यथा और POCSO
एक बच्चा जब जन्म लेता है,
वह जाति लेकर नहीं आता।
उसकी आँखों में
न कोई ऊँच-नीच होती है,
न कोई जाति की दीवार।
वह बस बच्चा होता है—
डर से दूर,
सपनों के करीब।
लेकिन समाज की पुरानी दीवारें
कभी-कभी उसके बचपन तक पहुँच जाती हैं।
गरीबी,
अशिक्षा,
सामाजिक भेदभाव,
और कमजोर आवाज़—
सब मिलकर
एक बच्चे को
और अधिक असुरक्षित बना सकते हैं।
यहीं कानून कहता है—
रुको।
यह बच्चा
किसी की संपत्ति नहीं।
यह शरीर
किसी की इच्छा का मैदान नहीं।
इसकी सुरक्षा
समाज की जिम्मेदारी है।
POCSO का संदेश
किसी जाति के लिए अलग नहीं—
हर बच्चे के लिए है।
चाहे वह
महल में जन्मा हो
या मजदूर की झोपड़ी में,
चाहे वह
किसी ऊँची जाति का कहलाए
या सामाजिक सीढ़ी के नीचे
धकेला गया हो—
उसका बचपन
बराबर मूल्य रखता है।
लेकिन सवाल यह भी है—
क्या कानून की किताब
हर गली तक पहुँचती है?
क्या हर परिवार
अपने बच्चे के अधिकार जानता है?
क्या डर के कारण
चुप हो जाने वाली आवाज़
कभी पुलिस स्टेशन तक पहुँच पाती है?
कभी गरीबी
आवाज़ रोकती है।
कभी सामाजिक दबाव।
कभी बदनामी का डर।
और कभी
अपनी ही व्यवस्था पर
भरोसा नहीं होता।
इसलिए POCSO
सिर्फ एक कानून का नाम नहीं—
यह याद दिलाता है
कि बच्चे की सुरक्षा
जाति, धर्म, वर्ग और हैसियत
से ऊपर है।
जिस बच्चे को
इतिहास ने किनारे किया,
कानून उसे
किनारे नहीं कर सकता।
उसकी चुप्पी को
सहमति मत समझो।
उसके डर को
कमज़ोरी मत समझो।
उसकी जाति को
उसकी कीमत मत समझो।
और उसके बचपन को
किसी भी सामाजिक पहचान से
छोटा मत समझो।
क्योंकि—
बच्चा पहले बच्चा है।
उसकी सुरक्षा
पहले सुरक्षा है।
उसकी गरिमा
पहले गरिमा है।
और न्याय—
तभी न्याय है
जब वह उस बच्चे तक भी पहुँचे
जिसकी आवाज़
सबसे कम सुनी जाती है।
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