कभी सिर पर जंगल था,
हर लट में एक दंगल था।
हवा चले तो बाल उड़ें,
आईना बोले — 'वाह! क्या रंग था।'
फिर एक दिन किस्मत बदली,
कंघी रोज़ उदास हुई।
जो बाल सुबह तक साथी थे,
शाम तक उनसे विदाई हुई।
आधा सिर वीरान हुआ,
शीशा भी हैरान हुआ।
हर नहाने के बाद लगा,
जैसे कोई अभियान हुआ।
तेल बदले, शैम्पू बदले,
नुस्ख़े बदले हज़ार।
दादी बोली प्याज़ लगा लो,
चाचा बोले नारियल अपार।
दोस्तों ने भी ताना मारा,
'भाई, माथा बढ़ता जा रहा! '
मैंने हँसकर इतना बोला,
'ज्ञान का क्षेत्र फैलता जा रहा।'
अब शुक्र है वो दौर थमा,
झड़ना भी कुछ कम हो गया।
जो बाल बचे हैं, उनसे मैंने
दोस्ती का वादा कर लिया।
अब हर सुबह मैं मुस्काता हूँ,
आईने से ये कह जाता हूँ—
'बाल कम हैं तो क्या हुआ,
हौसला अभी भी घना है।
सिर की मिट्टी चाहे दिख जाए,
दिल का जंगल अब भी हरा-भरा है।'
बाल अगर साथ छोड़ भी दें,
सपने साथ नहीं छोड़ते।
चेहरा उम्र से बदल सकता है,
पर हिम्मत वाले कभी नहीं टूटते। 🌿❤️
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