चरमसुख Poem by Pushp Sirohi

चरमसुख

किसी ने पूछा—
**चरमसुख क्या है? **

मैंने कहा—
शायद वो पल,
जब चाहत अपनी आवाज़ खो दे,
और ख़ामोशी
कुछ कहने लगे।

शायद वो स्पर्श,
जो त्वचा से गुज़रकर
सीधे आत्मा तक पहुँचे,
या वो ख़याल
जो आँखें बंद होते ही
पूरी दुनिया खोल दे।

कभी किसी की बाँहों में,
कभी किसी की यादों में,
कभी एक कविता की पंक्ति में,
कभी अकेलेपन की रातों में—

**चरमसुख
हर बार शरीर नहीं होता।**

कभी किताब का आख़िरी पन्ना
दिल को वैसा ही सुकून देता है,
जैसे बरसों की तलाश के बाद
कोई अपना मिल गया हो।

कभी पहाड़ की चोटी पर
हवा का एक झोंका
ऐसा नशा दे जाता है,
कि इंसान भूल जाता है
वो किस चीज़ की तलाश में निकला था।

और कभी…

किसी की आँखें
इतना कुछ कह जाती हैं
कि होंठों को
कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

शायद चरमसुख
पाना नहीं—

**पूरा हो जाना है।**

जहाँ इच्छा और तृप्ति के बीच
कोई दूरी न बचे,
जहाँ समय कुछ पल के लिए
अपना रास्ता भूल जाए,
और इंसान—

अपने भीतर
कुछ ऐसा छू ले
जिसे शब्दों में छूना संभव नहीं।

इसलिए जब अगली बार
कोई पूछे—

**"चरमसुख कहाँ मिलता है? "**

बस मुस्कुरा देना।

क्योंकि जिसे सच में पता होता है,
वह पता नहीं बताता…

**बस आँखों से
इशारा कर देता है।**

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