पुरानी मोटरसाइकिल और खटारा सी कार,
जैसे मिल गया हो कालू चाँद मोहम्मद को सदियों का उधार।
पीछे से महबूब खान का ट्रैक्टर भी आया,
धुएँ के गुबार में जिसने पूरा शहर नहलाया।
वो खटारा ट्रैक्टर और चरमराते उसके जोड़,
शहर की सड़कों पर मचाने निकले थे वो होड़।
बजा-बजा के हॉर्न उन्होंने 'हूँ-हूँ' की रट लगाई,
जैसे पूरी दुनिया की दौलत उनके हाथों आई।
सफेदपोश शहर को वो शोर से चिढ़ाते रहे,
फटी हुई अपनी गरीबी रफ़्तार में छुपाते रहे।
मगर अक्ल का पहिया भी शायद थोड़ा जाम था,
बिना तेल के उड़ना ही उनका आखिरी काम था।
बीच सड़क पे ट्रैक्टर और कार ने जब तोड़ दिया दम,
उतर गया सारा नशा और फुस्स हो गया भ्रम।
कल जो हॉर्न बजाकर दुनिया को डराते थे,
आज वही शेरों की तरह भीख माँगने जाते थे।
'एक ढक्कन पेट्रोल' की फिर वही पुरानी गुहार,
शर्म भी खड़ी थी बेचारी फुटपाथ के उस पार।
दिखावे की वो नुमाइश पल भर में ढह गई,
बस दोस्तों के एहसान की कड़वी याद रह गई।
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