अब्दुल सलाम कुम्हार और उसके बेटे
दीपों का मौसम, आई दिवाली,
मिट्टी बोली — 'चलो, कर लें तैयारी।'
अब्दुल सलाम कुम्हार चाक घुमाए,
दिन-रात मेहनत, दीप बनाए।
साथ खड़े उसके बेटे,
सपनों जैसे छोटे-छोटे।
हाथों में मिट्टी, आँखों में नूर,
थक जाएँ फिर भी रहें भरपूर।
सुबह से लेकर आधी रात,
मेहनत ही उनकी सच्ची बात।
एक-एक दीया प्यार से गढ़ते,
हर घर तक उजियारा करते।
न पूछो किसका घर, किसकी राह,
दीया जलता सबके साथ।
अपने पसीने की हर एक बूँद से,
रोशन करते भारत की हर रात।
पर खुद उनके चेहरे पर,
मिट्टी और कालिख छाई।
दूसरों के घर दीप जलाएँ,
अपनी थकान न दिखाई।
हाथों में मेहनत की रेखाएँ,
माथे पर पसीने की धार।
दुनिया को उजियारा देकर,
लौटें लेकर अँधियारा भार।
कैसा ये जीवन का मेला,
कैसा ये सुंदर व्यवहार।
जो सबके घर रोशन करते,
उनका भी हो उजला संसार।
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