खुदा से एक इल्तिज़ा Poem by Pushp Sirohi

खुदा से एक इल्तिज़ा

कुछ ऐसा कर मेरे मौला,
मेरी ये इल्तिज़ा क़ुबूल कर,
उसके दिल की हर धड़कन में
बस मेरा ही नाम मशहूर कर।

उसकी हर सोच की मंज़िल मैं रहूँ,
हर ख़्वाब में बस मेरी ही सूरत आए,
वो जब भी आँखें बंद करे,
तो मेरी ही तस्वीर नज़र आए।

उसे हर वक़्त बस मेरी ही तलब हो,
मेरे बिना उसे सुकून न मिले,
मेरी याद की ऐसी प्यास जगा दे,
कि दुनिया की कोई चीज़ उसे न भले।

उसके दिल में ऐसी तड़प उतार दे,
जो हर साँस में मेरा ही ज़िक्र करे,
मेरे बिना एक लम्हा भी गुज़रे तो
उसका दिल बेचैन फ़िक्र करे।

उसकी प्यास का हासिल बस मैं बनूँ,
मेरे होठों के रस से ही चैन पाए,
बना दे उसे मेरे इश्क़ की ‘मीरा',
जो दीवानी होकर बस मेरे ही गीत गाए।

मेरे प्यार को ऐसा पाक अमृत कर दे,
जो उसकी रूह में उतरता जाए,
और अगर कभी जुदाई की रात आए,
तो मेरी याद ही उसे जीना सिखाए।

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