पुरानी सवारी, नया उल्लास Poem by Pushp Sirohi

पुरानी सवारी, नया उल्लास

वो फटी जेबों के शहजादे,
आज बादलों के पार थे,
पुरानी कबाड़ सी मोटरसाइकिल पर,
वो खुशियों के सवार थे।

पूरे शहर में गूंजा शोर,
हवा से बातें करते चले,
'हूँ-हूँ' की उस आवाज़ में,
वो गम सारे पीछे छोड़ चले।

गली-कूचे और चौराहों पर,
हॉर्न का वो शोर मचाया,
जैसे बरसों का कोई सपना,
मिट्टी से निकलकर आया।

मगर खुशियों की टंकी छोटी थी,
रफ़्तार को लग गई नज़र,
खत्म हुआ जो वो बूंद भर ईधन,
थम गया वहीं सारा सफ़र।

फिर वही मंज़र, वही मजबूरियाँ,
दोस्तों के आगे हाथ पसारे,
एक-एक बूंद पेट्रोल की खातिर,
फिर माँग रहे थे वो सहारे।

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