कभी चमड़े की गंध में
रोटी तलाशते हाथ,
कभी मेहनत के बदले
मिलती हुई चुप्पी—
इतिहास ने
इन हाथों को देखा है।
काम उनका,
श्रम उनका,
पर सम्मान
किसी और के नाम।
गली वही रही,
रास्ते वही रहे,
बस समय बदलता गया।
कभी आवाज़
डंडे की थी,
कभी डमरू की,
आज सड़क पर
हॉर्न की है—
पीं... पीं...
क्या यह केवल
रास्ता माँगने की आवाज़ है?
या उन सदियों की
गूँज भी है
जिनमें कहा गया—
"चुप रहो।"
जिसे लंबे समय तक
अपनी मौजूदगी
साबित करनी पड़ी हो,
उसकी आवाज़
कभी-कभी शोर बन जाती है।
पर शोर के पीछे
एक कहानी है—
अपमान की,
मेहनत की,
भूख की,
पहचान की,
और उस स्वाभिमान की
जो मिटना नहीं चाहता।
आज वही हाथ
जूते भी बनाते हैं,
मशीनें भी चलाते हैं,
किताबें भी पढ़ते हैं,
कानून भी समझते हैं,
और अपने बच्चों के लिए
एक नया भविष्य भी लिखते हैं।
इसलिए—
हॉर्न को केवल शोर मत समझो।
उसके पीछे की
व्यथा भी सुनो।
क्योंकि सड़क पर
सबसे तेज़ आवाज़
हमेशा सबसे बड़ा सत्य नहीं होती।
कभी-कभी
उस शोर के पीछे
एक बहुत पुराना प्रश्न होता है—
"क्या अब
हमें भी बराबर समझा जाएगा? "
और संविधान की आवाज़
धीरे से उत्तर देती है—
"हाँ।
तुम्हारी गरिमा
तुम्हारा अधिकार है।
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारा अधिकार है।
और बराबरी
किसी की दया नहीं—
तुम्हारा अधिकार है।"
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