निकाह, तलाक और इंसानियत Poem by Pushp Sirohi

निकाह, तलाक और इंसानियत

मजहब नहीं, इंसानियत पहले

किसी धर्म का नाम लेकर
किसी इंसान की आवाज़
खामोश नहीं होनी चाहिए।

जहाँ विवाह हो,
वहाँ सहमति हो।

जहाँ रिश्ता हो,
वहाँ बराबरी हो।

जहाँ तलाक हो,
वहाँ भी इंसान की गरिमा
बची रहनी चाहिए।

बाल विवाह के आँगन में
बचपन की हँसी मत छीनो,
जिस उम्र में हाथों में
किताब होनी चाहिए,
उस उम्र में
जिम्मेदारियों का बोझ मत रखो।

जबरन विवाह की वेदी पर
किसी की इच्छा मत जलाओ—
निकाह तभी सुंदर है
जब दोनों की आवाज़
"हाँ" कहे।

बहुविवाह के प्रश्न पर
सिर्फ परंपरा मत पूछो,
उस स्त्री का मन भी पूछो
जिसे अपने ही रिश्ते में
बराबरी चाहिए।

और जहाँ किसी बच्ची के शरीर पर
उसकी इच्छा के बिना
स्थायी चोट की जाए,
वहाँ परंपरा से पहले
इंसानियत का प्रश्न खड़ा होता है।

शरीर किसी रस्म की
जायदाद नहीं,
शरीर पर पहला अधिकार
उस इंसान का है
जो उसमें जीता है।

और तलाक—

अगर एक शब्द में
किसी स्त्री की जिंदगी,
उसकी सुरक्षा,
उसका भविष्य
और उसका सम्मान
छीन लिया जाए,

तो सवाल केवल
कानून का नहीं,

सवाल है—

क्या रिश्ते में
दोनों इंसान बराबर थे?

मजहब को कटघरे में खड़ा करना
मेरा उद्देश्य नहीं,

कटघरे में खड़ी होनी चाहिए
वह हर प्रथा
जो इंसान की स्वतंत्रता
और गरिमा को कुचलती है।

क्योंकि—

अन्याय का कोई धर्म नहीं,
पीड़ा की कोई जाति नहीं,
आँसू का कोई मजहब नहीं।

बच्चा पहले बच्चा है।

स्त्री पहले इंसान है।

और हर मनुष्य—

पहले मनुष्य है।

इसलिए
धर्म की किताबें पढ़ो,
पर इंसान का चेहरा भी पढ़ो।

परंपरा निभाओ,
पर विवेक को मत मारो।

आस्था रखो,
पर दूसरे की स्वतंत्रता
मत छीनो।

क्योंकि अंततः
किसी भी समाज की महानता
उसकी रस्मों की संख्या से नहीं,

बल्कि इस बात से मापी जाएगी—

कि वहाँ
सबसे कमजोर व्यक्ति भी
कितनी गरिमा के साथ
जी सकता है।

मजहब अपनी जगह—

लेकिन

इंसानियत
सबसे पहले।

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