शोर के पीछे का सन्नाटा Poem by Pushp Sirohi

शोर के पीछे का सन्नाटा

पीं-पीं के पीछे की आवाज़

वह बार-बार हॉर्न बजाता है—

पीं... पीं...

सड़क पर रास्ता कम है,
पर भीतर शायद
कुछ और भीड़ है।

वह सामने वाले को
हटाना चाहता है,
शायद इसलिए नहीं
कि उसे जल्दी है—

बल्कि इसलिए
कि उसे लगता है
कोई उसे देख नहीं रहा।

पीं... पीं...

एक हॉर्न सड़क पर,
दूसरा हॉर्न भीतर।

कभी डंडा था,
कभी डमरू था,
आज हॉर्न है—

साधन बदलते गए,
पर मन में बसी
'मुझे सुनो'
की पुकार शायद वही रही।

वह हर मोड़ पर
अपनी मौजूदगी घोषित करता है—

'मैं आ रहा हूँ।'

लेकिन भीतर कहीं
एक धीमी आवाज़ पूछती है—

'क्या मुझे सचमुच
कोई देख रहा है? '

इसीलिए शायद
हॉर्न फिर बजता है।

पीं... पीं...

यह केवल आवाज़ नहीं,
कभी-कभी
अनसुनेपन का शोर भी होती है।

जिसे वर्षों तक
चुप रहने की आदत रही हो,
वह जब बोलना सीखता है
तो उसकी आवाज़
कभी-कभी बहुत तेज़ हो जाती है।

पर असली मुक्ति तब है
जब आवाज़ को
शोर बनने की जरूरत न पड़े।

जब पहचान के लिए
हर गली में हॉर्न न बजाना पड़े।

जब मन कह सके—

'मैं यहाँ हूँ।'

और सामने वाला कहे—

'हाँ,
मैं तुम्हें सुन रहा हूँ।'

तब डंडे की थाप,
डमरू की ध्वनि,
हॉर्न की पीं-पीं—

सब पीछे छूट जाएँगे।

और बचेगी सिर्फ

एक शांत आवाज़—

'मैं भी इस समाज का
बराबर हिस्सा हूँ।'

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