धर्म से ऊपर इंसान
व्यक्तिगत कानून, परम्परा और मानव अधिकार
किसी की आस्था को कटघरे में खड़ा करना मेरा उद्देश्य नहीं,
पर जहाँ इंसान रोता हो—
वहाँ सवाल पूछना भी अपराध नहीं।
कानून अगर इंसान के लिए है,
तो इंसान कानून से छोटा कैसे हो जाए?
परम्परा अगर सम्मान है,
तो न्याय उससे पीछे क्यों रह जाए?
कभी तीन शब्दों का डर था—
"तलाक… तलाक… तलाक…"
एक पल में रिश्ता टूटता,
और वर्षों का जीवन
एक आवाज़ में बिखर जाता।
मगर संविधान ने पूछा—
क्या विवाह केवल एक पक्ष की इच्छा है?
क्या स्त्री की गरिमा
किसी दूसरे की घोषणा पर निर्भर है?
समय ने करवट ली,
न्यायालय ने प्रश्न उठाया,
और संसद ने कानून बनाया—
कि तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक
अब भारत के कानून में वैध नहीं।
लेकिन सवाल केवल तीन तलाक का नहीं,
सवाल हर उस व्यवस्था का है
जहाँ जन्म से मिले किसी पहचान के कारण
किसी इंसान के अधिकार छोटे हो जाएँ।
निकाह हो या विवाह,
तलाक हो या विरासत,
मेहर हो या भरण-पोषण—
हर प्रश्न के केंद्र में
सबसे पहले इंसान होना चाहिए।
धर्म दिल में रहे—
कानून संविधान में रहे,
और दोनों के बीच
मानव गरिमा जीवित रहे।
किसी धर्म के करोड़ों लोगों को
कुछ प्रथाओं के बराबर मत समझो;
मुस्लिम समाज में भी
अलग-अलग विचार, अनुभव और आवाज़ें हैं।
मगर जहाँ कोई प्रथा
समानता से टकराती दिखाई दे,
वहाँ प्रश्न उठेगा—
बहस होगी—
न्यायालय बोलेगा—
और लोकतंत्र अपना रास्ता खोजेगा।
क्योंकि भारत में
नागरिक पहले इंसान है,
फिर उसकी पहचान कुछ भी हो।
न मंदिर छोटा हो,
न मस्जिद छोटी हो,
न किसी की आस्था का अपमान हो—
बस इतना हो कि
किसी इंसान का अधिकार
उसकी आस्था के नाम पर छोटा न हो।
कानून का अंतिम धर्म
न हिन्दू है, न मुस्लिम,
न सिख, न ईसाई—
कानून का अंतिम धर्म है—
न्याय।
और न्याय की अंतिम भाषा है—
मानव गरिमा।
समानता।
स्वतंत्रता।
और संविधान।
धर्म रहे—
पर अधिकार भी रहें।
परम्परा रहे—
पर प्रश्न भी रहें।
आस्था रहे—
पर इंसान सबसे पहले रहे।
क्योंकि जब कानून इंसान को बचाता है,
तभी संविधान
सिर्फ किताब नहीं—
जीता-जागता न्याय बनता है।
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