नकलची शूद्र- नकल की दीवार के पीछे छिपी पहचान Poem by Pushp Sirohi

नकलची शूद्र- नकल की दीवार के पीछे छिपी पहचान

किसी ने कहा—
'तुम्हारा काम यही है, '
उन्होंने वही कर लिया।

किसी ने कहा—
'तुम्हारी जगह यहाँ नहीं, '
उन्होंने जगह बदल ली।

किसी ने पहनावा बदला,
किसी ने भाषा बदली,
किसी ने नाम बदला,
किसी ने पहचान तक बदल ली—

और फिर आईना देखकर पूछा—

'हम कौन हैं? '

यही तो कहानी है
उस समाज की
जिसे सदियों तक
दूसरों का बनाया हुआ
सच मानने की आदत डाल दी गई।

नकल की भी
एक राजनीति होती है—

कोई सत्ता की नकल करता है,
कोई संस्कृति की,
कोई भाषा की,
कोई जीवनशैली की।

लेकिन इतिहास
किसी की नकल से नहीं बदलता।

जिस हाथ में
अपनी मिट्टी की खुशबू थी,
उसने दूसरों के इत्र को
अपनी पहचान समझ लिया।

जिसके पास
अपनी लोककथा थी,
उसने किसी और की कहानी
याद कर ली।

जिसके पास
अपना श्रम था,
उसने किसी और की
शान की नकल कर ली।

पर सवाल यह नहीं—

'तुमने किसकी नकल की? '

सवाल यह है—

'तुमने अपना क्या बनाया? '

क्योंकि
नकल करके
कपड़े बदले जा सकते हैं,
नाम बदले जा सकते हैं,
भाषा बदली जा सकती है—

लेकिन
इतिहास नहीं।

अपमान को
सम्मान की पोशाक पहनाने से
वह सम्मान नहीं बन जाता।

और किसी की
ऊँचाई की नकल करने से
अपनी ऊँचाई पैदा नहीं होती।

इसलिए—

ओ नकलची मन!

दूसरों की परछाईं
बनना छोड़।

अपनी मिट्टी पढ़,
अपनी कहानी लिख,
अपने श्रम को पहचान,
अपनी आवाज़ को सुन।

तुझे किसी की
नकल बनने की जरूरत नहीं।

तू स्वयं एक इतिहास बन सकता है।

कल तक
जिस हाथ को
दूसरों की दुनिया बनाने के लिए
इस्तेमाल किया गया,

आज वही हाथ
अपनी दुनिया बनाएगा।

और उस दिन
आईना पूछेगा—

'अब किसकी नकल करोगे? '

वह मुस्कुराकर कहेगा—

**'अब किसी की नहीं।

अब मैं अपनी नकल बनाऊँगा—
अपने ही कल से बेहतर।

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success