देखो आया लूला कबाड़ी Poem by Pushp Sirohi

देखो आया लूला कबाड़ी

देखो आया लूला कबाड़ी

देखो आया लूला कबाड़ी,
कंधे पर है बोरी भारी।
धूप, धूल और लंबी राहें,
फिर भी आँखों में चिंगारी।

टूटा लोहा, पुराने बर्तन,
यही उसकी रोज़ी-रोटी।
दिनभर मेहनत करता रहता,
फिर भी रहती जेब है छोटी।

लोग हँसते, कोई टालता,
कोई देता ताना भारी।
वह मुस्काकर आगे बढ़ता,
कहता, 'मेहनत मेरी सवारी।'

न महलों की उसे तमन्ना,
न सोने-चाँदी की चाह।
बस इतना हो—घर में चूल्हा जले,
बच्चों की खिल उठे हर राह।

मत देखो उसको उसकी कमी से,
मत तौलो उसके हालात।
हर इंसान की अपनी कहानी,
हर दिल की अपनी सौगात।

देखो आया लूला कबाड़ी,
मेहनत जिसकी सबसे प्यारी।
गरीबी उसकी पहचान नहीं,
हिम्मत ही उसकी असली सवारी।

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