एक पहाड़, एक श्रम, एक स्वाभिमान
पहाड़ों ने देखा है
किसके कंधों पर
गाँव बसे,
किसके हाथों से
खेत हँसे,
किसने पत्थरों को काटकर
रास्ते बनाए,
और किसने
अपनी पीठ पर
पहाड़ों का भार उठाया।
वे नाम इतिहास की
मोटी किताबों में शायद कम लिखे गए,
पर उत्तराखंड की मिट्टी पर
उनके पैरों के निशान
आज भी गहरे हैं।
वे थे—
जिन्हें समाज ने
कभी नामों में बाँटा,
कभी जातियों में,
कभी कामों में।
पर पहाड़ जानता है—
पत्थर उठाने वाले हाथ
पत्थर से छोटे नहीं होते।
जिस हाथ ने
हल पकड़ा,
उसी हाथ ने
रोटी उगाई।
जिस हाथ ने
लकड़ी काटी,
उसी हाथ ने
घर की आग जलायी।
जिस हाथ ने
सड़क बनाई,
उसी सड़क पर
आज पहाड़ की अर्थव्यवस्था चलती है।
फिर क्यों
उस हाथ की इज़्ज़त
उसके काम से नहीं,
उसकी जाति से तौली जाए?
अब समय है
परचम उठाने का—
किसी के विरुद्ध नहीं,
अपनी गरिमा के पक्ष में।
किसी सिंहासन को गिराने नहीं,
हर इंसान को बराबर खड़ा करने।
यह परचम
नफरत का नहीं होगा।
यह परचम होगा
श्रम का।
यह परचम होगा
सम्मान का।
यह परचम होगा
शिक्षा का।
यह परचम होगा
संविधान का।
उत्तराखंड की घाटियों से
जब यह आवाज़ उठेगी—
हम वही हैं
जिनके हाथों ने
तुम्हारे रास्ते बनाए थे।
तो पहाड़ जवाब देगा—
अब अपने रास्ते
तुम स्वयं बनाओ।
कभी डमरू बजाकर
दूरी बताई जाती थी,
आज किताबों की आवाज़ होगी।
कभी लकड़ी की थाप से
पहचान कराई जाती थी,
आज शिक्षा हमारी पहचान होगी।
कभी गाँव की सीमाएँ
जाति से तय होती थीं,
अब हमारी सीमाएँ
आसमान तय करेगा।
हम पहाड़ के बेटे हैं,
पहाड़ की बेटियाँ हैं—
हमारी नसों में
नदियों की तरह
मेहनत बहती है।
हमारी आँखों में
हिमालय की तरह
ऊँचे सपने हैं।
हमारी आवाज़ में
घाटियों की गूँज है—
हम झुकेंगे नहीं,
हम टूटेंगे नहीं,
हम रुकेंगे नहीं।
हम उठाएँगे
अपना परचम—
न किसी जाति को नीचा दिखाने के लिए,
न किसी मनुष्य से बदला लेने के लिए,
बल्कि यह कहने के लिए—
हम भी इस पहाड़ के बराबर नागरिक हैं।
जहाँ संविधान
हमारी ढाल है,
शिक्षा
हमारी मशाल है,
श्रम
हमारी पहचान है,
और स्वाभिमान
हमारा परचम।
उत्तराखंड की चोटियों पर
जब अगली सुबह आएगी,
तो शायद कोई पूछेगा—
किसका है यह परचम?
और पहाड़ की हवा
धीरे से कहेगी—
उन हाथों का,
जिन्होंने सदियों तक
दूसरों का संसार बनाया—
अब जो अपना संसार बना रहे हैं।
यह विद्रोह नहीं केवल—
यह जागरण है।
यह शोर नहीं केवल—
यह इतिहास की नई आवाज़ है।
यह परचम किसी के विरुद्ध नहीं—
यह मनुष्य की गरिमा के पक्ष में है।
और इतिहास के पन्नों पर
एक और सवाल लिखा है—
जिस तरह
शूद्रों को सदियों तक
मुख्यधारा से बाहर धकेला गया,
क्या उसी पीड़ा की कोई प्रतिध्वनि
पहाड़ों ने भी महसूस नहीं की?
उत्तर प्रदेश की विशाल व्यवस्था से
जब उत्तराखंड अलग हुआ,
तो पहाड़ ने केवल
एक नया राज्य नहीं पाया—
उसने अपनी
अलग पहचान की आवाज़ पाई।
जिन्हें कभी कहा गया—
"तुम किनारे हो, "
उन्होंने कहा—
"किनारा नहीं,
हम भी केंद्र हैं।"
जिन्हें समझा गया
कि वे केवल श्रम करेंगे,
उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी के हाथों में
हल के साथ
कलम भी रख दी।
और आज—
उत्तराखंड का परचम
हवा में केवल कपड़ा नहीं,
यह उन लोगों की स्मृति है
जिन्होंने पहाड़ उठाए,
रास्ते बनाए,
खेत सँभाले,
शहरों को श्रम दिया,
और फिर भी
अपनी पहचान के लिए
लड़ते रहे।
उत्तर प्रदेश से अलग हुआ उत्तराखंड—
और इतिहास ने एक सवाल छोड़ा:
क्या किसी भूगोल को
अलग होने के लिए
पहले अपनी आवाज़ खोनी पड़ती है?
नहीं।
पहाड़ कहता है—
हम किसी से निकाले गए लोग नहीं,
हम अपनी पहचान गढ़ने वाले लोग हैं।
और शूद्र कहता है—
हम किसी की दया के पात्र नहीं,
हम अपने श्रम और संविधान से
अपनी गरिमा लिखने वाले लोग हैं।
इसलिए आज
दोनों आवाज़ें
एक ही दिशा में उठें—
"पहाड़ हो या मैदान,
जाति हो या भूगोल—
मनुष्य की गरिमा
सबसे ऊँची हो।"
और हिमालय की चोटी पर
लहराता रहे—
उत्तराखंड का परचम,
श्रम का परचम,
स्वाभिमान का परचम।
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