गुनाह-ए-मोहब्बत Poem by Pushp Sirohi

गुनाह-ए-मोहब्बत

अगर चाहना गुनाह था
तो सज़ा पूरी मिली

वो आज भी बेदाग है
और बदनामी मुझे मिली

सच कहना भी जुर्म बन गया
ख़ामोशी ही राहत बन गई

इल्ज़ाम सिर्फ़ उसी पर आया
जिसका नाम पुष्प

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