भारत—मेरी मातृभूमि Poem by Pushp Sirohi

भारत—मेरी मातृभूमि

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भारत—मेरी मातृभूमि,
कान में आज एक प्रचंड सी सरगोशी—
अब वक़्त आ गया है, समझ ले तू,
तू केवल देश नहीं… तू युगों की चेतना है।
तेरी रेटिंग अब किसी कागज़ पर नहीं,
तेरी पहचान अब इतिहास की धड़कन है,
और दुनिया को कहना पड़ेगा—
'हाँ… भारत अब जाग चुका है।'

तूने बीते दिनों में
कुछ ऐसे कदम उठाए हैं
जो तुझे उस साधारणता से
बहुत ऊपर ले आए हैं
जिसमें कभी
दूसरे तुझे देखकर मुस्कराते थे,
और तू चुप रहकर
अपनी सहनशीलता को ही महानता मान बैठी थी।

जो लोग खुद को श्रेष्ठ समझते थे,
जिनकी सरपरस्ती की बैसाखी पर
दुनिया के कुछ हिस्से खड़े थे,
अब उन्हें भी सलामी देनी होगी—
उस गौरव को जो तेरा है।
अब तुझे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं,
अब तू अकेली खड़ी है—सीधी, अडिग, निर्भय।
और दुनिया ने तुझे 'बहुत' माना है,
तो फिर—
उसी 'बहुत' की तरह चल!

अब न कोई पश्चिम से,
न उत्तर से,
न किसी 'चुनी हुई' धरती से
फूले हुए अहंकार का बोझ लेकर
तेरे सामने
अपमान की भाषा बोल सकेगा।
क्योंकि अब दुनिया जानती है—
तेरी असली हैसियत क्या है,
तेरी शक्ति क्या है,
तेरी मित्रता क्या है…
और तेरी शत्रुता क्या है।
अब टोपियाँ उतरती हैं—
और सही उतरती हैं!

तूने रणभूमि को वीर दिए हैं,
तूने क्रांति को आवाज़ दी है,
तूने शांति के लिए भी
अपनी छाती पर
समय की तलवार झेली है।
तेरे धैर्य ने पर्वत तोड़े,
तेरे साहस ने समुद्र मापे,
और तेरे ज्ञान ने
दुनिया को दिशा दी है।
तेरा मूल्य अब
किसी की प्रमाण-पत्र नहीं,
तेरा मूल्य अब
तेरे कर्म की मुहर है।

पर बता भारत—
क्या तूने खुद भी मान लिया?
क्या तूने अपनी शक्ति को
अपनी आँखों से पहचाना?
क्या अब तेरे भीतर
वो तेज है
कि तू अपने ही प्रकाश में खड़ी होकर कह सके—
'जो मैं करती हूँ—
वो दिव्य है,
वो महान है,
वो मेरा है! '

तोप का एक वार
पुरानी बेड़ियों को तोड़ देता है,
रिवाज़ों की जड़ता को गिरा देता है
काली, गहरी, अथाह खाई में।
काँप उठते हैं
पूर्वग्रह के ताज,
और पक्षपात के लकवाग्रस्त कदम।
हाँ—हथियार मारते हैं,
पर यह भी सत्य है
कि हथियार ही
कभी-कभी
अधिकार को जन्म देते हैं,
अन्याय का अंत करते हैं,
और नई दुनिया की शुरुआत लिखते हैं।
ईश्वर करे—
कि यह जागरण
तेरे भीतर
और भी तेज़ जगे!

मेरे कान लालायित हैं
तेरे आत्मविश्वास के जयघोष के लिए,
मेरे मन को चाहिए
तेरा वह वफ़ादार गीत,
तेरा वह मर्दाना गर्व,
जो तेरे विश्वास को
विश्वास से भी ऊँचा कर दे।
कला हो, विज्ञान हो, व्यापार हो, युद्ध हो—
कभी इस सिद्धांत से पीछे मत हटना—
'जो हमारा है—वो श्रेष्ठ है।'
और इसे समझे जाने से मत डरना,
क्योंकि दुनिया
उसी को मानती है
जो खुद को मानता है।

भारत—
अपना शाही माथा ऊँचा कर,
अपनी शान का साहस रख।
आज तुझ पर 'निर्भीकता' जँचती है,
आज तुझे आत्मगौरव शोभा देता है।
तेरे भीतर
राम की मर्यादा है,
कृष्ण की नीति है,
अर्जुन का धैर्य है,
और शिव का प्रचंड तांडव है।
तेरे भीतर
बुद्ध की शांति है,
और भगतसिंह की आग।
तू मंदिर की घंटी भी है,
और सीमा पर उठी
सावधानी की घंटी भी।

भव्य बन भारत,
गर्व से भरपूर बन,
अपनी महानता से
स्वयं संतुष्ट बन—
क्योंकि दुनिया में कोई राष्ट्र
निम्नता और अभाव से उठकर
गौरव के शिखर तक नहीं पहुँचा
जो अपने मूल्य से
स्वयं परिचित न हो।

और आज…
दुनिया को बता दे—
भारत किसी का अनुसरण नहीं करता,
भारत मार्ग बनाता है।
भारत किसी की छाया नहीं,
भारत सूर्य है।
भारत किसी का पिछलग्गू नहीं,
भारत नेतृत्व है।

भारत—मेरी मातृभूमि,
तेरे चरणों में
मेरे शब्द नहीं—
मेरी सांसें हैं।
तेरी शान में
मेरी कविता नहीं—
मेरा प्रण है।

जय हिन्द! 🇮🇳🔥 -- पुष्प सिरोही

भारत—मेरी मातृभूमि
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