गलियों के 'बादशाह' और अक्ल के खाली Poem by Pushp Sirohi

गलियों के 'बादशाह' और अक्ल के खाली

बड़े मज़े में देखता हूँ, इन गली के आवारा फकीरों को,
जो सड़कों की धूल छानकर, कोसते हैं अपनी लकीरों को।
सारा दिन यूँ ही भटकते हैं, जैसे कोई बड़ा काम हो,
मगर जेब में फूटी कौड़ी नहीं, बस आवारागर्दी का नाम हो।

सोचता हूँ, जितनी एड़ियाँ इन गलियों में रगड़ते हैं,
जितना वक्त ये 'हूँ-हूँ' वाली फालतू बातों में बिगड़ते हैं,
अगर उसका आधा भी किताबों के पन्नों पर दिया होता,
तो आज किसी के आगे यूँ हाथ फैलाना न पड़ता।

वो कालू हो या महबूब, सबका एक ही है रोना,
काम-धाम कुछ करना नहीं, बस वक्त है इन्हें खोना।
दिन भर नवाब बने फिरते हैं, सड़कों पे रौब झाड़ते हैं,
और रात को वही पुराने दोस्तों के आगे दामन पसारते हैं।

पढ़ाई के नाम पर जिनको चढ़ता था तेज़ बुखार,
आज वो सड़कों पे मांगते फिरते हैं पेट्रोल का उधार।
शर्म बेच खाई है इन्होंने, और हया का नामोनिशान नहीं,
इनसे बड़ा इस शहर में कोई और 'बेशर्म' इंसान नहीं।

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success