बंद हैं कागज़ों में भट्टे Poem by Pushp Sirohi

बंद हैं कागज़ों में भट्टे

कागज़ बोले — 'रोक लगा दो,
धुएँ से अब धरती बचा लो।'
हवा ने भी यही पुकारा,
'नीला अपना अम्बर बचा लो।'

फिर भी धुआँ उठता हर दिन,
आसमान को ढँक जाता।
किसके आदेश, किसकी जिम्मेदारी?
मन यह प्रश्न उठाता।

नियम अगर सबके लिए हैं,
तो पालन भी सबका हो।
कानून की मर्यादा ऐसी,
जो हर व्यक्ति पर समान हो।

बच्चों को स्वच्छ हवा मिले,
खेत रहें हरियाले।
विकास भी आगे बढ़ता जाए,
पर साँस न हों काले।

न किसी उद्योग से बैर हमारा,
न मेहनतकश से कोई शिकायत।
बस इतनी-सी विनती है—
नियमों का हो समान अनुपालन और पूरी ईमानदारी से हिफ़ाज़त।

जब कानून सब पर एक-सा होगा,
तभी बढ़ेगा देश महान।
स्वच्छ हवा और न्याय के संग,
मुस्कुराएगा हिंदुस्तान।

बंद हैं कागज़ों में भट्टे
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