कुछ बच्चे उन बस्तियों से आते,
जहाँ वेश्यावृत्ति से घर चलते हैं।
हर शाम जब सूरज ढलता था,
उनकी माँएँ चुपचाप घर से निकलती थीं।
रोटी की कीमत देह से चुकाकर,
ज़िंदगी किसी तरह आगे बढ़ती थी।
बचपन चौखट पर ठहरा रहता,
आँखों में अनगिनत सवाल लिए।
क्यों हर रात कोई अजनबी आता?
क्यों सपने लौटते खाली हाथ लिए?
गली-गली फिरते वे लड़के,
मोटरों के हॉर्न बजाते जाते।
शायद दुनिया सुन ले एक दिन,
जो दर्द किसी से कह न पाते।
लोग कहते—'कितने बदतमीज़ हैं',
कोई उनके भीतर झाँक न पाया।
जिनका बचपन मजबूरियों में खो गया,
उन्होंने ग़ुस्से को ही साथी बनाया।
पर सच इतना भर नहीं होता—
दर्द किसी को अधिकार नहीं देता।
जो पीड़ा उन्हें मिली, वह गहरी होगी,
फिर भी किसी और का चैन छीनना
उस पीड़ा का उपचार नहीं होता।
समाज अगर उनके घाव समझे,
तो शायद शोर कुछ कम हो जाए।
और हर बच्चा, चाहे उसका जन्म कहीं भी हुआ हो,
सम्मान, शिक्षा और उम्मीद के साथ बड़ा हो पाए।
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