कुरीतियों के पार — इंसान Poem by Pushp Sirohi

कुरीतियों के पार — इंसान

धर्म की आस्था अपनी जगह,
पर सवाल भी ज़रूरी है—

जब परंपरा
किसी इंसान की गरिमा छीनने लगे,
तो क्या उसे
सिर्फ परंपरा कहकर
बचा लेना चाहिए?

बाल विवाह के मंडप में
जब बचपन बैठा हो,
तो शहनाई की आवाज़ से पहले
बच्चे की आवाज़ सुनो।

दहेज की आग में
जब बेटी का सपना जले,
तो रस्मों की सूची नहीं,
उसकी आँखों के आँसू पढ़ो।

जाति की दीवारों के पीछे
जब इंसान को इंसान से बाँटा जाए,
तो पूछो—

क्या जन्म
किसी की कीमत तय कर सकता है?

छुआछूत के नाम पर
किसी हाथ को दूर किया जाए,
तो याद रखो—

जिस मिट्टी से
मंदिर बना है,
उसी मिट्टी से
मनुष्य भी बना है।

विधवा के जीवन पर
जब समाज पहरा बैठाए,
तो उससे पूछो—

उसका जीवन
उसका अपना क्यों नहीं?

स्त्री की आवाज़ को
जब मर्यादा के नाम पर दबाया जाए,
तो पूछो—

मर्यादा किसकी?
और निर्णय किसका?

धर्म अगर
मनुष्य को सत्य,
करुणा और न्याय सिखाता है,

तो ऐसी हर कुरीति
जो मनुष्य को छोटा करे,
उसे प्रश्नों से गुजरना ही होगा।

क्योंकि सुधार
धर्म का अपमान नहीं—

सुधार तो उस समाज की शक्ति है
जो अपनी गलतियों को
पहचानने का साहस रखता है।

मंदिर रहेंगे,
आस्था रहेगी,
परंपराएँ भी रहेंगी—

लेकिन उनके बीच
इंसान सबसे ऊपर रहेगा।

न जन्म किसी को ऊँचा करेगा,
न जन्म किसी को नीचा।

न दहेज बेटी की कीमत होगा,
न जाति इंसान की पहचान।

और उस दिन
जब परंपरा के साथ
विवेक भी चलेगा,

तब धर्म केवल
पूजा की जगह नहीं रहेगा—

वह बनेगा

करुणा,
न्याय,
समानता
और इंसानियत का रास्ता।

कुरीतियाँ टूटेंगी,

आस्था नहीं।

भेदभाव टूटेगा,

समाज नहीं।

और बचेगा—

सबसे सुंदर सत्य:

मनुष्य पहले,

बाकी पहचानें बाद में।

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