कहते हैं शिव अमर हैं…
पर मैंने उन्हें मरते देखा है।
ना कैलाश हिला,
ना डमरू बजा…
ना तांडव हुआ उस रात,
सिर्फ एक गहरा सन्नाटा था —
जो ब्रह्मांड को तोड़ रहा था।
गंगा उनकी जटा से बहना भूल गई थी,
चाँद उनके माथे से फिसलकर
अँधेरे में खो गया था…
और नीलकंठ…
पहली बार ज़हर नहीं,
शून्य पी रहा था।
उस रात,
शिव ने आँखें बंद नहीं कीं…
उन्होंने अस्तित्व बंद कर दिया।
ना "ॐ" बचा,
ना "नाद"…
सिर्फ एक खाली गूंज थी —
जो खुद से पूछ रही थी,
"अगर शिव नहीं… तो मैं कौन? "
पार्वती ने पुकारा…
पर आवाज़ वापस आ गई,
जैसे प्रेम भी उन तक पहुँचने से
डर रहा हो।
नंदी चुप था,
त्रिशूल ज़मीन में धँस गया था…
और काल भी रुककर सोच रहा था —
"जिसे मैं ख़त्म करता हूँ,
आज वो खुद ख़त्म हो रहा है? "
शिव का शरीर वहाँ था…
पर शिव नहीं थे।
वो ना रोशनी बने,
ना अँधेरा…
वो कुछ भी नहीं बने।
वो सब कुछ छोड़कर,
"कुछ भी न होने" में विलीन हो गए।
और तब समझ आया…
शिव मरते नहीं।
शिव हर बार मरते हैं —
जब अहंकार ज़िंदा होता है।
शिव हर बार लौटते हैं —
जब कोई अपने अंदर का सब कुछ जला देता है।
शिव का अंत,
दरअसल हर जीव का आरंभ है।
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